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risk of dementia and death: आजकल भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अधिकांश लोगों को कम सोने की आदत है. कई लोग अपने काम को लेकर तनाव में रहते हैं. इसके अलावा कई लोग पर्सनल मामलों में भी परेशान रहते हैं. ऐसे लोगों की नींद रात में गायब हो जाती है. अगर रातों की नींद जल्दी वापस चली आए तो सही है, लेकिन अगर इसकी आदत लग गई, तो उम्र बढ़ने के साथ ही यह कई तरह की परेशानियों को बढ़ावा दे सकती है. इसका सबसे ज्यादा असर दिमाग पर पड़ता है जिसमें बोध वाला हिस्सा प्रभावित हो जाता है. इससे भूलने की बीमारी लग जाती है जिसे डिमेंशिया (dementia ) कहते हैं. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल (Harvard Medical School) के एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर रात में कम सोने की आदत है, तो उम्र बढ़ने के साथ ही डिमेंशिया परेशान कर सकती है.

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सोने के पैटर्न पर निर्भर है बीमारी
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने दो स्टडी के विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष दिया है. पहली स्टडी में टीम ने नेशनल हेल्थ एंड एजिंग ट्रेंड्स स्टडी ( National Health and Ageing Trends) द्वारा इकट्ठा किए गए नमूनों का विश्लेषण किया. इसमें 2013 से 2014 के बीच लोगों के सोने के पैटर्न संबंधित जानकारी जुटाकर अध्ययन किया गया. इस स्टडी में 2800 मेडिकेयर लाभार्थियों से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत के आधार पर सर्वे किया गया. अध्ययन में पूछा गया कि डिमेंशिया से पहले सोने का पैटर्न कैसा था. इसमें यह भी देखा गया कि डिमेंशिया होने के कितने दिनों बाद मौत हुई.

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लगातार छह घंटे से कम नींद खतरे का संकेत
अध्ययन में पाया गया कि जो लोग जो पांच घंटे से कम की नींद रात में लेते थे, उनमें डिमेंशिया का जोखिम छह घंटे से ज्यादा सोने वालों की तुलना में दोगुना से ज्यादा था. इतना ही नहीं ऐसे लोगों में समय से पहले मौत की आशंका उन लोगों से दोगुनी थी जो रात को छह से आठ घंटे सोते थे. इस अध्ययन में उम्र, स्थान, जाति, शिक्षा, हेल्थ, वैवाहिक स्थिति, शरीर का वजन आदि बातों को मानक बनाया गया था. दूसरा अध्ययन यूरोप के देशों में किया गया. इसमें 800 डिमेंशिया से पीड़ित लोगों पर पांच साल तक बारीकी से अध्ययन किया गया. अध्ययन में पाया गया कि जो लोग रात को लगातार 6 घंटे से कम की नींद लेते थे, उनमें 30 प्रतिशत से भी ज्यादा डिमेंशिया की शिकायतें आई.

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