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Formula Milk For Infants: दूध तो हमेशा से ही बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पोषण का सबसे जरूरी अंग माना जाता रहा है.  आज बाजार में सामान्य दूध (Normal Milk) के साथ-साथ फॉर्मूला मिल्क (Formula Milk ) भी पोषण के एक बेहतर ऑप्शन के रूप में उपलब्ध है. फॉर्मूला मिल्क में ज्यादा आयरन, प्रोटीन और फैट होता है, इसलिए लोग इसे वरीयता देते हैं. लेकिन अब एक नई स्टडी में ये पता चला है कि नवजातों को परिष्कृत फॉर्मूला मिल्क (Refined formula milk) पिलाने से उनके दिमागी स्तर यानी आईक्यू (Intelligence quotient) लेवल (IQ Level) पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (British Medical Journal) में प्रकाशित यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (University College London) की एक रिसर्च के अनुसार, नॉर्मल दूध और फॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों का दिमागी स्तर बराबर ही रहता है.

इस रिसर्च के दौरान साइंटिस्टों ने 11 से 16 साल तक के बच्चों के रिजल्ट की स्टडी की. इस स्टडी के लिए 1700 किशोरवय बच्चों (Teenage Children) का चयन किया गया था. इसमें दोनों ही बच्चे शामिल थे. एक जिन्हें बचपन में नॉर्मल दूध पिलाया गया था और दूसरे जिन्हें फॉर्मूला मिल्क पिलाया गया था. रिसर्चर्स ने इस दौरान दोनों वर्गों के बच्चों के अंग्रेजी और मैथ्स विषयों के नंबरों का अध्ययन किया.

इस स्टडी में निकला कि गणित विषय में 11 से 16 साल के जिन बच्चों ने बचपन में सामान्य दूध पिया और जिन्होंने फॉर्मूला मिल्क पिया, उन दोनों के नंबर समान ही निकले. ऐसे ही नतीजे अंग्रजी विषय में भी निकले.

किन बच्चों में अलग मिला ट्रेंड
हालांकि 11 साल तक की उम्र के बच्चों में ये ट्रेड थोड़ा सा अलग मिला. जिन बच्चों को फॉमूला मिल्क दिया गया था उनके अंग्रेजी और गणित में नंबर सामान्य दूध पीने वाले बच्चों से कम आए. लेकिन रिसर्च में ये बात साबित नहीं हो पाई है कि आखिर फॉर्मूला मिल्क पीने वाले 11 साल तक की आयु वाले बच्चों के नंबर कम क्यों आए?

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रिसर्चर्स का मानना है कि इस स्टडी के नतीजों से फॉर्मूला मिल्क को लेकर जो भ्रांतियां हैं वो दूर हो सकेंगी, साथ ही मिल्क प्रोड्यूसर्स भी अब फॉर्मूले में बदलाव कर सकेंगे.

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पहले की स्टडीज में क्या निकला था 
इससे पहले की स्टडीज के अनुसार ये माना जाता था कि एक्स्ट्रा प्रोटीन, आयरन, कार्बोहाईड्रेट और फैट वाले फॉर्मूला मिल्क पिलाने से नवजातों के बौद्धिक विकास में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इससे बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होता है.

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