गूलर के फायदे

             गूलर यह आयुर्वेद ग्रंथों की बहुचर्चित औषधि है. अथर्ववेद में भी इसके पौष्टिक गुणों की प्रशंसा की गई है. इस वृक्ष के कच्चे फक्के फल दूध, पत्ते, तने की छाल, जड़ की छाल आदि औषधि के रूप में काम में लिये जाते हैं, अत: गूलर अति उपयोगी औषधीय वनस्पतियों में से एक सुप्रसिद्ध वृक्ष है. गांव-घरों में भी दवा के तौर पर इसका व्यापक प्रयोग किया जाता है. गूलर को लेकर अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं. इसको ‘अपुष्पा’ भी कहा जाता है. गूलर के फूल दिखाई नहीं पड़ते हैं अथवा गुप्त रूप में होते हैं. कहा जाता है जिस व्यक्ति को गूलर का पुष्प मिल जाए वह अविलंब धनधान्य से पूर्ण हो जाता है. यह भी मान्यता है कि जिस स्थान पर गूलर का पेड़ होता है उसके नीचे अथवा अगल-बगल मीठे और स्वास्थकर जल का स्त्रोत होता है. इसके फल में सूक्ष्म जंतु भी पाए जाते हैं, जो अन्दर ही स्वयंजात रूप में होते हैं. 

Gular-Ke-Fayede
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भाषा भेद के अनुसार इसके विविध नाम हैं: 

  1. संस्कृत- उदुम्बर, 
  2. हेमदुग्ध, अपुष्पा 
  3. हिन्दी- गूलर, काकमाल 
  4. मराठी- औदुम्बर 
  5. लेटिन- फाइकस ग्लोमेराटा 

            गूलर शरीर के रंग को निखारने वाला दाह (जलन शांत करने वाला, वेदना मिटाने वाला, घाव को शुद्ध करके भरने वाला, शुक्र स्तम्भक, अस्थि जोड़ने वाला, गर्भाशयशोथहारी, गर्भरक्षक तथा रक्त, पित्त, प्रदर, प्रमेह, प्रवाहिका, संग्रहणी, बवासीर, कुष्ठरोग, मुखरोग, नेत्र रोग नाशक है. यह शीतवीर्य, गुरू, रुक्ष, मधुर, कटुविषा की, कसौला और पित्त कफ शामक होता है. यह धातुपोषक, दौर्बल्यहारक एवं मधुमेह में उत्तम पथ्य भी है. प्रातः सूर्योदय से पूर्व गूलर के तने में चाकू से गोद दे वहां से दूध टपकना शुरू हो जाता है. इसे कटोरी में एकत्र कर लिया करें. 

रोगानुसार गूलर का उपयोग तथा विविध प्रयोग 

अतिसार- गूलर के पत्ते 15 ग्राम 250 ग्राम पानी में पकाएं चौथाई भाग जल शेष रहने पर आधा सुबह और आधा शाम को पिलायें. इससे दस्तों व विशेषकर आववाले दस्तों में लाभ होता है. 
रक्तप्रदर रोग- (1) गूलर के तीन चार पके फल एक एक करके दिन में 3-4 बार ले. खाने के पूर्व फल बीच में ही तोड़कर उसके जन्तु उड़ा दें फिर उसमें 2-2 चम्मच मिश्री का चूर्ण डाल लिया करें हर प्रकार का रक्तप्रदर, रक्तपित्त, रक्तार्श, नकसीर आदि में लाभ होता है. 
(2) गूलर के कच्चे फलों को सुखा लें फिर उसका चूर्ण बना लें. समभाग मिश्री के साथ चूर्ण बनाकर रख लें. 10 ग्राम ताजे जल से सुबह- शाम लें. तीव्रावस्था में दिन में 3 बार लिया जा सकता है. हर प्रकार के रक्तस्त्राव आदि पर उपयोगी है. 
मधुमेह- कच्चे फलों को उबालकर शाक बनाकर प्रतिदिन खाना चाहिए. कच्चे फलों को सुखाकर रख लें. बेमौसम पकाने के पूर्व थोड़ा भिगोकर उबालकर इनका शाम बनाया जा सकता है. इसमें यथासंभव चिकनाई का प्रयोग न किया जाए. यह मधुमेह रोगी के लिये पौष्टिक एवं सहयोगी दवा के रूप में भी काम करता है. स्वस्थ्य व्यक्ति भी अगर इसके शाक का समय- समय पर प्रयोग करे तो मधुमेह, मूत्ररोग एवं नेत्ररोगों से बचाव होता है. 
एलोपेथी दवाइयों के साइड इफेक्ट- गूलर के 11 पके पत्ते डंठल की ओर से गिलास में पानी में भिगोयें 12 घंटे बाद पानी छान कर प्रात: पी लें. इससे अति दवाइयों के लेने के बाद जो शरीर में दवाओं से आग, जलन, खुजली, चर्मरोग होते हैं उसमें फायदा होता है. 
धातु क्षीणता, दौर्बल्यनाश एवं पोषण हेतु- (1) गूलर का 10-15 बूंद दूध को बताशे में छेद करके भर लें. प्रात: दूध के साथ लें. गूलर को दूध लेने से शुक्र-तरलता दूर हो जाती है और शरीर बलवान बन जाता है. 
(2) गूलर के कच्चे अथवा पके फलों को सुखाकर रख लें. अब यह सुखे हुये गलूर फल और बिदारीकंद समभाग लेकर चूर्ण बना लें. 3 ग्राम से 6 ग्राम तक प्रातः सायं 2-2 चम्मच शुद्ध घी मिले हुये दूध के साथ सेवन करते रहें. उत्तम बाजीकरण है. इससे अधिक उम्र के व्यक्ति भी सजीव, चेतन्य व गृहस्थ धर्म में समर्थ हो जाते हैं. इसके साथ पाचन व सामान्य स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए. 
(3) गूलर के पके हुये फल 1-2 प्रतिदिन खाते रहे. कुछ पके फल सुखाकर रख लें. जब पके फल न मिले तो सूखे फलों का चूर्ण बनाकर समान भाग मिश्री मिलाक 2 चम्मच दूध से प्रात: सायं सेवन करें. यह भी स्तम्भक और शरीर व स्नायुविक क्रियावर्धक है.
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