[ad_1]

Mata Sati ke Janm ki Kahani: हिन्दू पुराणों (Hindu Puran) में हर देवी देवता की अलग अलग कहानी का वर्णन मिलता है. माता सती (Mata Sati) के जन्म से जुड़ी एक रोचक कथा का वर्णन मिलता है. दक्ष प्रजापति (Daksh Prajapati) की कई पुत्रियां थीं और सभी रूपवान और गुणवान थीं. लेकिन राजा दक्ष को उनसे संतोष नहीं था. वे चाहते थे कि उनकी एक ऐसी पुत्री हो जो सर्व शक्ति संपन्न हो. इसके लिए राजा दक्ष घोर तप करने लगे. तप करते हुए कई दिन बीत गए. दक्ष के तप से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि, “मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ मैं स्वयं तुम्हारे यहां तुम्हारी पुत्री के रूप में जन्म लूंगी और मेरा नाम सती होगा”. आइए जानते हैं क्या है पूरी कहानी.

इसके बाद माता भगवती ने सती के रूप में राजा दक्ष के यहां जन्म लिया. माता सती दक्ष की सभी पुत्रियों में अलौकिक थीं. बाल्यावस्था से ही उन्होंने अपनी माया दिखानी शुरू कर दी थी. जिसे देखकर दक्ष भी विस्मय में पड़ जाते थे. धीरे धीरे माता सती विवाह योग्य हो गईं तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी. उन्होंने ब्रह्माजी से परामर्श मांगा. परमपिता ब्रम्हा जी बोले,’सती भगवती देवी का अवतार हैं वे आदि शक्ति हैं और शिव आदिपुरुष, अतः शिव के अतिरिक्त सती से विवाह के लिए कोन उचित होगा”. परमपिता की बात मानकर दक्ष ने सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया और सती कैलाश में शिव के साथ रहने लगीं.

इसे भी पढ़ें : Bhagwan Shiv ki Kahani: क्यों भगवान शिव डर कर छिपे थे गुप्ताधाम की गुफा में, जानें कहानी

राजा दक्ष और भगवान शिव में विवाद

राजा दक्ष भगवान शंकर से विरोधाभास रखते थे, और एक बार ब्रह्मा जी ने एक सभा का आयोजन किया उस सभा में भगवान शंकर भी ध्यान लगाए बैठे थे. जब राजा दक्ष वहां पहुंचे तो सभी ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया, परन्तु शिव तो ध्यान में थे उन्होंने न दक्ष को देखा और न खड़े हुए. फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया. केवल यही नहीं, उनके हृदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी, और वे भगवान शंकर से बदला लेने के लिए समय और अवसर का इंतजार करने लगे.

भगवान शिव का अपमान 

समय बीतता गया और एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को बुलाया. परन्तु शिव से बैर भाव के कारण उन्होंने भगवान शिव को उस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया. जब माता सती को यह बात पता चली तो वें क्रोधित हो गईं उस समय भगवान शंकर समाधि में थे. अतः वे शिवजी से अनुमति लिए बिना ही वीरभद्र को साथ लेकर अपने पिता के घर चलीं गईं. यज्ञ में सभी देवी देवता शामिल हुए थे लेकिन भगवान शिव को न देखकर वें क्रोधित हो उठीं तो उनके पिता दक्ष ने उनको अपमानित करते हुए कहा कि तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैंं. वह तुम्हे बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता है. दक्ष के कथन से सती के हृदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा.

इसे भी पढ़ें : Surya Upasana: अक्सर रहते हैं बीमार तो इस विधि से सूर्य को अर्पित करें जल होगा फायदा

वीरभद्र ने राजा दक्ष का मस्तक धड़ से अलग कर दिया

स्त्री के लिए उसका पति ही सब कुछ होता है अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनकर वें बोलीं, “इस सभा में मेरे सामने मेरे पति का अपमान हुआ है. अब मैं एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती” सती यह कहते हुए उसी यज्ञ के कुंड में कूद पड़ी. यज्ञ मंडप में हाहाकार मच गया. वीरभद्र ने क्रोधित होकर उस यज्ञ को छिन्न भिन्न कर डाला. सभी ऋषि मुनि भागने लगे. वीरभद्र ने देखते ही देखते राजा दक्ष का मस्तक धड़ से अलग कर दिया.

माता सती के 51 स्थानों पर अंग
माता सती की भक्ति और उनके प्रेम ने भगवान शंकर को व्याकुल कर दिया. वे प्रचंड आंधी की तरह यज्ञ स्थल पर जा पहुंचे. सती के जले हुए शरीर को देखकर वे अपने आपको भूल गए. वे सती के प्रेम में बेसुध हो गए उन्होंने सती के शरीर को अपने हाथों में उठा लिया और सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे. इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी, वायु, जल का प्रवाह रुक गया. इस भयानक स्थिति से सृष्टि को उबारने के लिए भगवान विष्णु को आगे आना पड़ा.
भगवान शंकर बेसुध होकर यहां वहां हर दिशा में घूम रहे थे इसी बेसुधी में विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के एक-एक अंग को काटने लगे. पृथ्वी पर जिन इक्क्यावन स्थानों पर माता सती के अंग कट-कट कर गिरे. वे स्थान आज शक्ति पीठ जाने जाते है. आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)



[ad_2]

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published.