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नागार्जुन आंदोलनकारी भी रहे हैं. आजादी से पहले 1939 और 1942 में बिहार के किसान आन्दोलनों में नागार्जुन की सक्रियता के कारण अंग्रेजी हकूमत ने उन्हें जेल में डाल दिया था. आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ने के कारण इमरजेंसी के समय भी उन्हें 11 महीने जेल में गुजारने पड़े. इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ जब छात्र आंदोलन शुरू हुआ था, उस वक्त इस आंदोलन को कुचलने की बेतरह कोशिश की गई थी.


हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बन्दर बापू के!
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बन्दर बापू के!
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!

नागार्जुन की यह कविता पढ़ते हुए कई-कई बंदरों की याद आती है और कई-कई बंदर आज के समय में भी उछलते कूदते नजर आते हैं. राजनीतिक विद्रूप के खिलाफ ताल ठोंकती नागार्जुन की ऐसी ही कुछ कविताओं से रू-ब-रू होंगे हम इस स्पेशल पॉडकास्ट में. स्वीकार करें पूजा प्रसाद का नमस्कार. दोस्तो, नागार्जुन की कविताएं राजनीति-सामाजिक छद्म की बखिया उधेड़ते नजर आती हैं. नागार्जुन 30 जून 1911 में जन्मे थे और 5 नवंबर 1998 में उनका निधन हुआ था. चूंकि उन्होंने आजादी के पहले और आजादी के बाद की स्थितियों को अपनी सजग राजनीतिक और सामाजिक चेतना के कारण बेहद करीब से देखा था. इसलिए उनकी कविताओं में उन स्थितियों पर बेहद निर्भीक और गहरी टिप्पणियां दिखती हैं. कहने की बात नहीं कि वे बेबाक कवि थे. उनकी कविताओं में उनके सुर कभी आपको हकलाते हुए नहीं मिलेंगे, बल्कि उनकी आवाज ताल ठोंककर तमाम विसंगतियों को मुंह चिढ़ाती नजर आएंगी. ‘बाकी बच गया अंडा’ शीर्षक कविता उन्होंने 1950 में लिखी थी. आइए सुनें और महसूसें उनकी पैनी दृष्टि, जिसमें वे देश की स्थितियों का बयान कर रहे हैं.

बाकी बच गया अंडा

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड़कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा

बिहार के दरभंगा जिले में जन्मे थे नागार्जुन. बिहार तब भी प्रखर राजनीतिक चेतना से लैस था. ऐसे माहौल में पलते-बढ़ते नागार्जुन ने सत्ता की साजिशों को पहचानना बखूबी सीखा था. साजिशों का प्रतिरोध उनकी प्रकृति थी. तो आजादी के बाद जब जवाहरलाल के उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने इंदिरा गांधी को आते देखा, तो उनका प्रतिरोध फूटा कविता ‘आओ रानी’ के मार्फत. आइए सुनें नागार्जुन की कविता ‘आओ रानी’

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

आओ शाही बैण्ड बजायें,
आओ बन्दनवार सजायें,
खुशियों में डूबे उतरायें,
आओ तुमको सैर करायें
उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चाँदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

सैनिक तुम्हें सलामी देंगे
लोग-बाग बलि-बलि जायेंगे
दॄग-दॄग में खुशियां छ्लकेंगी
ओसों में दूबें झलकेंगी
प्रणति मिलेगी नये राष्ट्र के भाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

बेबस-बेसुध, सूखे-रुखडे़,
हम ठहरे तिनकों के टुकडे़,
टहनी हो तुम भारी-भरकम डाल की
खोज खबर तो लो अपने भक्तों के खास महाल की!
लो कपूर की लपट
आरती लो सोने की थाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो
दायें-बायें खडे हज़ारी आफ़िसरों से प्यार लो
धनकुबेर उत्सुक दिखेंगे, उनको ज़रा दुलार लो
होंठों को कम्पित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो
बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो

यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेडो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

नागार्जुन आंदोलनकारी भी रहे हैं. आजादी से पहले 1939 और 1942 में बिहार के किसान आन्दोलनों में नागार्जुन की सक्रियता के कारण अंग्रेजी हकूमत ने उन्हें जेल में डाल दिया था. आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ने के कारण इमरजेंसी के समय भी उन्हें 11 महीने जेल में गुजारने पड़े. इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ जब छात्र आंदोलन शुरू हुआ था, उस वक्त इस आंदोलन को कुचलने की बेतरह कोशिश की गई थी. यह अलग बात है कि इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश करतीं इंदिरा गांधी को जनता ने सत्ता से बेदखल कर दिया. इसी आंदोलन के दौरान नागार्जुन ने कविता लिखी थी – शासन की बंदूक. आइए सुनें – शासन की बंदूक

खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक

और अब वक्त गंवाए बिना सुनें वह कविता जहां गांधी के आदर्श तीन बंदरों को प्रतीक बनाकर उन्होंने उस राजनीति की बघिया उधेड़ दी जो गांधी के पद चिह्नों पर चलने का ढोंग करती रही. कविता है – तीन बंदर बापू के

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के!

सर्वोदय के नटवरलाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जियेंगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

लम्बी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
बूढ़े हैं फिर भी जवान हैं, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
सौवीं बरसी मना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को हीबना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!

बच्चे होंगे मालामाल
ख़ूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
पूँछों से छबि आँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बन्दर बापू के!
मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बन्दर बापू के!

छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के!
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के!
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के!
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के!
गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के!

दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बन्दर बापू के!
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बन्दर बापू के!
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!

अपनी कविताओं से छद्म राजनीति की नींव हिला देनेवाले विद्रोही कवि नागार्जुन को याद करना हमेशा सुखद लगता है. इस क्रम में हम यह भी याद रखना चाहते हैं कि नागार्जुन महज विद्रोही कवि नहीं थे. वह प्रकृति प्रेमी भी थे, वे समाज चिंतक भी थे. इसलिए प्रेम और चिंता की दोनों धाराएं नागार्जुन की कविताओं में हमें मिलती है. जी हां, दोस्तो अब आज वक्त हो चला है विदा लेने का. इसलिए पूजा प्रसाद को इजाजत दें. फिर मिलूंगी किसी और रचनाकार के साथ अगले पॉडकास्ट में. नमस्कार.



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