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World Diabetes Day 2021: आजकल के लाइफस्टाइल में डायबिटीज (Diabetes) विश्व में बड़ी समस्या के रूप में उभरी है. भारतीय युवा आबादी में डायबिटीज के काफी रोगी (Diabetes Patients) हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हर साल डायबिटीज को लेकर जागरूकता के लिए 14 नवंबर (14 November) को वर्ल्ड डायबिटीज डे (World Diabetes Day) मनाया जाता है. इस बीमारी को रोकने के लिए न केवल जागरूकता बल्कि लाइफस्टाइल में बदलाव भी अहम है. शहरों में अनियमित खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी कम होने की वजह से डायबिटीज के मरीज ज्यादा देखने को मिलते हैं. स्वीडन की एक यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में की गई हालिया स्टडी में ब्लड में मौजूद ऐसे प्रोटीन का पता लगाया गया है, जो 19 साल पहले तक टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 diabetes) की आशंकाओं के बारे में जानकारी दे सकता है. इस स्टडी का निष्कर्ष नेचर कम्युनिकेशन (Nature Communications) जर्नल में प्रकाशित किया गया है.आपको बता दें कि टाइप 2 डायबिटीज वैश्विक महामारी के रूप में उभर रही है, जिससे फिलहाल दुनियाभर की 6 फीसद आबादी पीड़ित है.

अपने वजन पर नियंत्रण, खानपान की आदतों को ठीक करने और नियमित एक्सरसाइज के जरिये टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 diabetes) के खतरे को रोका जा सकता है, इतना ही नहीं अगर शुरुआत में इसका पता लगाकर हेल्थ से जुड़ी अन्य जटिलताओं को कम किया जा सकता है.

क्या कहते हैं जानकार
इस स्टडी को लीड करने वालीं व लुंड यूनिवर्सिटी (Lund University) की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ यांग डी मैरिनिस (Yang De Marinis) ने कहा, ‘हमने पाया कि ब्लड में ज्यादा मात्रा में फालिस्टैटिन प्रोटीन (follistatin protein) का संचार 19 साल पहले तक टाइप 2 डायबिटीज की भविष्यवाणी कर सकता है.’

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स्टडी में 5 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया
स्वीडन और फिनलैंड (Sweden and Finland) के विभिन्न स्थानों की गई स्टडी में 5,318 लोगों को शामिल किया गया.  4 साल से 19 साल की अवधि में सामने आए परिणामों के आधार पर स्टडी का निष्कर्ष निकाला गया. फालिस्टैटिन प्रोटीन (follistatin protein) का स्राव मुख्य रूप से लिवर से होती है, जो उपापचय यानी मेटाबॉलिज्म (Metabolism) का नियमन यानी रेगुलेशन करता है.

बीमारी के मैकेनिज्म को समझने में मिल सकती है मदद
डॉ यांग डी मैरिनिस (Yang De Marinis) कहती हैं, ‘ये स्टडी बताती है कि फालिस्टैटिन टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 diabetes) का एक अहम बायोमार्कर (biomarkers) बनने की क्षमता रखता है. यह हमें बीमारी के तंत्र (mechanisms of disease) यानी इसके मैकेनिज्म को समझने में भी मदद करता है.’

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फिलहाल, शोधकर्ता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित एक प्रणाली विकसित करने में जुटे हैं, ताकि इस स्टडी के निष्कर्ष का रोग की पहचान व उसके इलाज में इस्तेमाल किया जा सके.

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